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Rabindra Nath Banerjee जीस्त१ में नक़्श-ए-वफ़ा२ नक़्श-ए-सुवैदा३ ही रहा,
फिक़्र में दर्द-ए-दवा महज़ वो जुनूँ-जौला४ ही रहा!
होने को हो भी गया जो भी होना था वो लिखा,
होने ने तमाम किया होना आख़िर होना ही रहा!
ज़िक्र-ए-अन्द्दोह-ए-वफ़ा५ कर दिया कशाकश६ दुरुस्त,
दहर७में कोहकंन८ सरगश्त:-ए-खुमार-ए-रूसूम-ओ-क़ुयूद९ ही रहा!
हाकिम की पूरकारी१० है जो रह्बर भी दुश्मन है बना,
ईबादत खाने में हमेशा नाशेह से रूसवा ही रहा!
मौत जो आ भी गया महरबा करेंगे जुरूर,
ऐसे भी ख्वाहिशों से 'रंजन' महरूम ही रहा!
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